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लक्ष्मी साधना

रोटी कपडा और मकान ये तीनो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण विषय है | जिनकी प्राप्ति के लिए व्यक्ति निरंतर लगा रहता है | इसे प्राप्त करने के लिए पथ भ्रस्ट तक हो जाता है | उपरोक्त तीनो ही विषय देवी लक्ष्मी से सम्बंधित है | लक्ष्मी ये धन की देवी है | यदि इनका आशीर्वाद व्यक्ति को प्राप्त हो तो वह इस नश्वर संसार में आनंद पूर्वक जीवन व्यतीत करता है ! व्यक्ति को पग पग पर कठिनाइयां महसूस होती है | जीवन असहज लगने लगता है | एक बार की बात है जब महर्षि दुर्वासा के शाप से इंद्र के साथ त्रिलोकी की श्री नष्ट हो गई | यह वो समय काल था जिस समय यह घटना घटित हुई ठीक दूसरी और हरी के निर्देश पर समुद्र मंथन चल रहा था | विष्णु कश्यप अवतार धारण कर उस पर्वत को आधार दे रहे थे जिसको देवता तथा राक्षसों द्वारा मंथन के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा था | मंथन से सर्व प्रथम क्षीर सागर की गर्भ से कालकूट नमक विष निकला जिसका पान भगवन शंकर ने कर समस्त चराचर को जीवनदान दिया मंथन के दौरान सागर के गर्भ से १३ अमूल्य धरोहर के उपरांत देवी लक्ष्मी सिन्धुमुत हुई | उनके रूप से सभी मुग्ध हो गए थे , सभी उनकी कामना करने लगे थे | किसी ने आसन दिया , किसी ने वस्त्र , किसी ने स्नान कराया | सबने माला , आभरण आदि अपनी उत्कृष्टतम वस्तुओ से सत्कार किया | उन जगद्धात्री ने सबकी सेवाएं स्वीकार कर ली | हाथ में कमलो की माला लेकर बे अपने योग्य पुरुष का वरन करने चली थी | जिस को भी देखती मन ही मन कहती ये क्रोधी है , ये कुरूप है , ये अल्पायु है , ये भयानक है | देव, दैत्य , गन्धर्व , नाग , यक्ष , मानव , ऋषि , यहाँ तक की लोकपाल और स्वयं सदाशिव को भी स्वयं के लिए उपयुक्त उन्होंने नही माना | तब अंत में देवी लक्ष्मी ने हरी को देखा और विचार किया 'ये तो मेरी और देखते ही नहीं' | दोनों हाथों में वरमाला लिए महालक्ष्मी उनकी और देखती रही उन परम पुरुष की और | वे समुद्र मंथन के अपने कार्य में तलीन थे | उन्होंने रमा को देखकर भी नहीं देखा | एक ही अनुकूल पुरुष और वो इतना निरपेक्ष | लक्ष्मी जी को दूसरा पुरुष दीखता हे नहीं था | उन्होंने जय माला विष्णु जी के गले में दाल दी और सर झुक कर खड़ी हो गई | विष्णु जी ने अपनी चिर - सहचरी को ह्रदय में स्थान दिया | भगवन के वक्ष के वामभाग पर जो स्वर्णिम रोमावली -आवृत है | वही माहा लक्ष्मी का धाम है | तब पुनः लोक-परलोक को श्री की प्राप्ति हुई | दीपावली में लक्ष्मी साधना प्रति वर्ष कार्तिक मॉस आरम्भ होते ही शीतल वायु के कोमल स्पर्श से मीठी मीठी सिरहन होने लगती है और मन दीपावली की उमंग में भर उठता है | दीपावली पर लक्ष्मी पूजा का अपना महत्त्व है | निर्धन हो या धनि सभी वर्गों के लोग दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के लिए मूर्ती अवश्य लाते है | व्यापारी वर्ग के लिए भी दीपावली बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसी दिन लक्ष्मी पूजा करके वे नया कार्य आरम्भ करते है | लक्ष्मी को चंचल कहा गया है क्योंकि यह किसी एक स्थान पर अधिक समय तक स्थिर नही रहती | इसलिए दीपावली पर हर वर्ग के लोग अपने जीवन में लक्ष्मी आगमन के लिए पूजा अर्चना करते है और संपन्न व्यक्ति इसे अपने घर में स्थिर रखने के लिए मनाते है |